Friday, 13 April 2018

Munawwar Rana Gazal मैं अपने हलक से छुरी गुज़रता हु

इससे पहले हमने Waseem Barelvi साहब की गजले पढ़ी आज फिर से हम Munawwar Rana साहब की नयी ग़ज़ल पढेंगे इससे पहले की पोस्ट में हमने Children Poem In Hindi पढ़ी थी.

Munawwar Rana Gazal

Mai Apne Halak Se Apni Hi Churi Guzarta Hoo
Bade Hi Qarb Se Ye Zindagi Guzarta Hoo

Tasawwurat Ki Duniya Bhi Khoob Hoti Hai
Main Roz Sahra Se Koi Nadi Guzarta Hoo

Main Ek Hakeer Sa Jugnu Hi Sahi Phir Bhi
Main Har Andhere Se Kuch Raushni Guzarta Hoo

Yahi To Fan Hai Ki Main Is Bure Zamane Me
Sama-ato Se Nayi Shayari Guzarta Hoo

Kahi Pe Baith Ke Hansna Kahi Pe Ro Dena
Main Zindagi Bhi Badi Dogli Guzarta Hoo

मुनव्वर राना कविता

मैं अपने हलक से अपनी ही चुरी गुज़रता हूँ
बड़े ही करब से ये ज़िन्दगी गुज़रता हूँ

तसव्वुरता की दुनिया भी खूब होती है
मैं रोज़ सहरा से कोई नदी गुज़रता हूँ

मैं एक हकीर सा जुगनू ही सही फिर भी
मैं हर अँधेरे से कुछ रौशनी गुज़रता हूँ

यही तो फेन है की मैं इस बुरे ज़माने में
समातो से नयी शायरी गुज़रता हूँ

कही पे बैठ के हँसना कही पे रो देना
मैं ज़िन्दगी भी बड़ी दोगली गुज़रता हूँ

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